Essay On Environment Safety In Hindi

एक स्वच्छ वातावरण एक शांतिपूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक है। लेकिन मनुष्य के लापरवाही से हमारा पर्यावरण दिन ब दिन गन्दा होता जा रहा है। यह एक मुद्दा है जिसके बारे में हर किसी को पता होना चाहिए खासकर के बच्चो को। हम कुछ निम्नलिखित निबंध प्रदान कर रहे है जो की पर्यावरण पर लिखा है जो आपके बच्चो व छात्रों को स्कूल प्रोजेक्ट और निबंध प्रतियोगिता में भाग लेने में मदद करेंगी|

पर्यावरण पर निबंध (एनवायरनमेंट एस्से)

You can get below some essays on Environment in Hindi language for students in 100, 150, 250, 300, 400 and 500 words.

पर्यावरण निबंध 1 (100 शब्द)

वातावरण एक प्राकृतिक परिवेश है जो पृथ्वी नामक इस ग्रह पर जीवन को विकसित, पोषित और नष्ट होने में मदद करता है। प्राकृतिक वातावरण पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व में एक बड़ी भूमिका निभाता है और यह मनुष्यों, पशुओं और अन्य जीवित चीजो को बढ़ने और स्वाभाविक रूप से विकसित होने में मदद करता है। लेकिन मनुष्य के कुछ बुरे और स्वार्थी गतिविधियों के कारण हमारा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। यह एक महत्वपूर्ण विषय है और हर किसी को हमारे पर्यावरण को कैसे बचाया जाये और इसे सुरक्षित रखने के बारे में जानना चाहिए ताकि इस ग्रह पर जीवन के अस्तित्व को जारी रखने के लिए प्रकृति का संतुलन सुनिश्चित हो सके|

पर्यावरण निबंध 2 (150 शब्द)

जैसा की हम सब लोग पर्यावरण से भली भाति परिचित है, पर्यावरण वह है जो प्रकिृतिक रूप से हमारे चारो तरफ है और पृथ्वी पर हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करता है। जो हवा हम हर पल सांस लेते है, पानी जो हम अपनी दिनचर्या में इस्तेमाल करते है, पौधें, जानवर और अन्य जीवित चीजे यह सब पर्यावरण के तहत आता है। जब प्राकृतिक चक्र किसी भी गड़बड़ी के बिना साथ साथ चलता रहे तब एक पर्यावरण स्वस्थ वातावरण कहा जाता है| प्रकृति के संतुलन में किसी भी प्रकार का बाधा वातावरण को पूरी तरह प्रभावित करता है जो की मानव जीवन का नाश कर देता है|

इंसान की उन्नत जीवन स्तर के युग में, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, वनों की कटाई, जल प्रदूषण, मिट्टी प्रदूषण, अम्ल वर्षा और तकनीकी प्रगति के माध्यम से मनुष्यो द्वारा किये गए अन्य खतरनाक आपदाओं के रूप में हमारा प्रदुषण काफी हद तक प्रभावित हो रहा है| हम सभी को हमारे प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा के लिए और इसे सामान्य रूप से सुरक्षित रखने के लिए एक साथ शपथ लेनी चाहिए।

पर्यावरण निबंध 3 (250 शब्द)

पर्यावरण का मतलब है सभी प्राकृतिक परिवेश जैसे की भूमि, वायु, जल, पौधें, पशु, ठोस सामग्री, कचरा, धूप, जंगल और अन्य वस्तु। स्वस्थ वातावरण प्रकृति के संतुलन को बनाए रखता है और साथ ही साथ पृथ्वी पर सभी जीवित चीजों को बढ़ने, पोषित और विकसित करने में मदद करता है। हालांकि अब कुछ तकनीकी उन्नति परिणाम स्वरुप मानव निर्मित चीजे वातावरण को कई प्रकार से विकृत कर रहीं हैं जोकि अंततः प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रही है। हम अपने जीवन को साथ ही साथ इस ग्रह पर भविष्य में जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे हैं|

यदि हम प्रकृति के अनुशासन के खिलाफ गलत तरीके से कुछ भी करते हैं तो ये पूरे वातावरण के माहौल जैसे की वायु-मंडल, जलमंडल और स्थलमंडल को अस्तव्यस्त करती है। प्राकृतिक वातावरण के अलावा, मानव निर्मित वातावरण भी मौजूद है जो की प्रौद्योगिकी, काम के माहौल, सौंदर्यशास्त्र, परिवहन, आवास, सुविधाएं और शहरीकरण के साथ सम्बंधित है| मानव निर्मित वातावरण काफी हद तक प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित करता है जिसे हम सभी एकजुट होकर बचा सकते हैं|

प्राकृतिक वातावरण के घटक संसाधन के रूप में उपयोग किया जाता है हालाँकि कुछ बुनियादी भौतिक जरूरतों और जीवन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए इंसान द्वारा इसका शोषण किया जाता है| हमें हमारे प्राकृतिक संसाधनों को चुनौती नहीं देनी चाहिए और पर्यावरण में इतना प्रदूषण या अपशिष्ट डालने में रोक लगानी चाहिए। हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों को महत्व देना चाहिए और प्राकृतिक अनुशासन के तहत उन्हें इस्तेमाल करना चाहिए।


 

पर्यावरण निबंध 4 (300 शब्द)

हमें कई प्रकार से मदद करने के लिए वातावरण में हमारे आस पास की सभी प्राकृतिक संसाधन शामिल है| यह हमें आगे बढ़ने और विकास करने के लिए बेहतर माध्यम प्रदान करता है। यह हमें इस ग्रह पर जीवन जीने के लिए सभी चीजे देता है। हालांकि, हमारे वातावरण को भी ये जैसा है वैसे ही बनाये रखने के लिए हम सब की मदद की जरुरत होती है, ताकि ये हमारे जीवन को पोषण दे सके और हमारे जीवन को बर्बाद न करे। मानव निर्मित प्रौद्योगिकीय आपदा की वजह से हमारे पर्यावरण के तत्वों में दिन ब दिन गिरावट आ रही है।

सिर्फ पृथ्वी ही एक ऐसी जगह जहा पर ही पुरे ब्रह्मांड में जीवन संभव है, और पृथ्वी पर जीवन जारी रखने के लिए हमें हमारे पर्यावरण की मौलिकता को बनाए रखने की जरूरत है| विश्व पर्यावरण दिवस एक अभियान है जो कई वर्षो से हर साल 5 जून को पूरे विश्व में पर्यावरण सुरक्षा और सफाई के लिए जनता में जागरूकता का प्रसार करने के लिए मनाया जाता है। हम अपने पर्यावरण को बचाने के तरीके और सभी बुरी आदतें जो की हमारे पर्यावरण को दिन ब दिन नुकसान पंहुचा रहा है के बारे में जानने के लिए हमें इस अभियान में भाग लेना चाहिए|

हम पृथ्वी के हर व्यक्ति के द्वारा उठाए गए छोटे कदम से बहुत ही आसान तरीके से हमारे पर्यावरण को बचा सकते हैं जैसे की; कचरे की मात्रा कम करना, कचरे को ठीक से उसकी जगह पर फेकना, पोली बैग का इस्तेमाल बंद करना, पुराने वस्तुओं को नए तरीके से पुन: उपयोग में लाना, टूटी हुई चीजों का मरम्मत करना और पुन: उपयोग में लाना, रिचार्जेबल बैटरी या अक्षय एल्कलाइन बैटरी का उपयोग करना, फ्लोरोसेंट प्रकाश का प्रयोग करना चाहिए, वर्षा जल संरक्षण करना, पानी की बर्बादी को कम करना, ऊर्जा संरक्षण करना, और बिजली का कम से कम उपयोग इत्यादि|

पर्यावरण निबंध 5 (400 शब्द)

पर्यावरण पृथ्वी पर जीवन के पोषण के लिए प्रकृति द्वारा भेंट दी गयी है। वह हर चीज जो हम अपने जीवन जीने के लिए इस्तेमाल करते है वो पर्यावरण के अंतर्गत आता है जैसे की पानी, हवा, सूरज की रोशनी, भूमि, पौंधें, जानवर, जंगल और अन्य प्राकृतिक चीजें। हमारा पर्यावरण पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन का अस्तित्व बनाये रखने में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, आधुनिक युग में हमारा पर्यावरण मानव निर्मित तकनीकी उन्नति के कारण दिन ब दिन बद्तर होती जा रही है। इस प्रकार, पर्यावरण प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बन गयी है जिसका हम आज सामना कर रहे हैं।

पर्यावरण प्रदूषण हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे की सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, भावनात्मक और बौद्धिक को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। पर्यावरण का दूषितकरण कई रोगों को लाता है जिससे इंसान पूरी जिंदगी पीड़ित हो सकता है। यह किसी समुदाय या शहर की समस्या नहीं है, बल्कि ये पुरे दुनिया की समस्या है जो की किसी एक के प्रयास से खत्म नहीं हो सकता। अगर इसका ठीक से निवारण नहीं हुआ तो ये एक दिन जीवन का अस्तित्व खत्म कर सकता है। हर आम नागरिक को सरकार द्वारा शुरू की गयी पर्यावरण सुरक्षा कार्यक्रम में भाग लेना चाहिए।

हमें हमारे पर्यावरण को स्वस्थ्य और प्रदुषण से दूर रखने के लिए अपने स्वार्थ और गलतियों को सुधारना होगा। यह विश्वास करना मुश्किल है, लेकिन सच है की हर किसी द्वारा केवल एक छोटे से सकारात्मक आंदोलनों की वजह से बिगड़ते पर्यावरण में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। वायु और जल प्रदूषण विभिन्न बीमारियों और विकारों द्वारा हमारे स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं। आज कल हम किसी भी चीज को सेहतमंद नहीं कह सकते क्योकि जो हम खाते है वो पहले से ही कृत्रिम उर्वरकों के दुष्प्रभाव से प्रभावित हो चूका है और हमारे शरीर को रोगों से लड़ने की छमता को कमजोर कर दिया है| यही कारण है कि हम में से कोई भी स्वस्थ और खुश रहने के बावजूद कभी भी रोगग्रस्त हो सकता है।

अतः यह दुनिया भर के लिए गंभीर मुद्दा है जो हर किसी के निरंतर प्रयासों से हल होना चाहिए। हमें विश्व पर्यावरण दिवस में भाग लेना चाहिए ताकि हम सक्रिय रूप से पर्यावरण सुरक्षा कार्यो में भाग ले सके|


 

पर्यावरण निबंध 6 (500 शब्द)

वो सभी प्राकृतिक चीजें जो पृथ्वी पर जीवन संभव बनाती है पर्यावरण के अंतरगर्त आती है जैसे की जल, वायु, सूर्य के प्रकाश, भूमि, अग्नि, वन, पशु, पौंधें, इत्यादि| ऐसा माना जाता है की केवल पृथ्वी ही पुरे ब्रह्माण्ड में एक मात्र ऐसा गृह है जहा जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक पर्यावरण है| पर्यावरण के बिना यहाँ हम जीवन का अनुमान नहीं लगा सकते इसीलिए हमें भविष्य में जीवन की संभावना सुनिश्चित करने के लिए अपने पर्यावरण को स्वस्थ्य और सुरछित रखना चाहिए| यह पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है| हर किसी को आगे आना चाहिए और पर्यावरण की सुरक्षा के अभियान में शामिल होना चाहिए।

प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पर्यावरण और जीवित चीजो के बीच नियमित रूप से विभिन्न चक्र घटित होते रहते है। हालांकि, अगर किसी भी कारण से ये चक्र बिगड़ जाते हैं तो प्रकृति का भी संतुलन बिगड़ जाता है जो की अंततः मानव जीवन को प्रभावित करता है। हमारा पर्यावरण हजारो वर्षो से हमें और अन्य प्रकार के जीवो को धरती पर बढ़ने, विकसित होने और पनपने में मदद कर रहा है। मनुष्य पृथ्वी पर प्रकृति द्वारा बनाई गई सबसे बुद्धिमान प्राणी के रूप में माना जाता है इसीलिए उनमे ब्रह्मांड के बारे में पता करने की उत्सुकता बहोत ज्यादा है जोकि उन्हें तकनीकी उन्नति की दिशा में ले जाता है।

हर व्यक्ति के जीवन में इस प्रकार की तकनीकी उन्नति दिन-ब-दिन पृथ्वी पर जीवन के संभावनाओं को खतरे में डाल रहा है क्योकि हमारा पर्यावरण धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है| ऐसा लगता है की ये एक दिन जीवन के लिए बहोत हानिकारक हो जाएगी क्योकि प्राकृतिक हवा, मिट्टी और पानी प्रदूषित होते जा रहे हैं| हालाँकि यह इंसान, पशु, पौधे और अन्य जीवित चीजों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। हानिकारक रसायनों के उपयोग द्वारा कृत्रिम रूप से तैयार उर्वरक जो की मिट्टी को खराब कर रहे हैं परोक्ष रूप से हमारे दैनिक खाना खाने के माध्यम से हमारे शरीर में एकत्र हो रहे हैं। औद्योगिक कंपनियों से उत्पन्न हानिकारक धुँआ दैनिक आधार पर प्राकृतिक हवा को प्रदूषित कर रहे हैं जो की काफी हद तक हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं क्योकि इसे हम हर पल साँस लेते हैं|

इस व्यस्त, भीड़ और उन्नत जीवन में हमे दैनिक आधार पर छोटी छोटी बुरी आदतों का ख्याल रखना चाहिए। यह सत्य है की हर किसी के छोटे से छोटे प्रयास से हम हमारे बिगड़ते पर्यावरण की दिशा में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। हम हमारे स्वार्थ के लिए और हमारे विनाशकारी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का गलत उपयोग नहीं करना चाहिए। हम हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास करना चाहिए लेकिन हमेशा यह सुनिश्चित रहे की भविष्य में हमारे पर्यावरण को इससे कोई नुकसान न हो। हमें सुनिश्चित होना चाहिए की नई तकनीक हमारे पारिस्थितिकी संतुलन को कभी गड़बड़ न करे|

 

लोकप्रिय पृष्ठ:

भारत के प्रधानमंत्री

सुकन्या समृद्धि योजना

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ


Previous Story

पेड़ बचाओ पर निबंध

Next Story

ग्लोबल वार्मिंग निबंध

Home » स्वास्थ्य और पर्यावरण (Health and Environment)

स्वास्थ्य और पर्यावरण (Health and Environment)

बढ़ते औद्योगीकरण और उन्नत औद्योगिकी के कारण पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण में व्यवधान उत्पन्न हो गया है। इस व्यवधान ने प्रकृति के स्वाभाविक सामंजस्य को असंतुलित कर दिया है और, चूँकि मानव-जीवन प्रकृति का अभिन्न अंग हैं, इसलिए बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने इंसान के जीवन को भी असंतुलित कर दिया है। यह तो अविवादित सत्य है कि आज के बढ़ते औद्योगीकरण और तकनीकी विकास ने इंसान को ऐसी अति-आधुनिक सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं, जिनके कारण उसका जीवन अप्रत्याशित रूप से सरल और सहज बन गया है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बढ़ते औद्योगीकरण और उन्नत औद्योगिकी के कारण पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण में व्यवधान उत्पन्न हो गया है। इस व्यवधान ने प्रकृति के स्वाभाविक सामंजस्य को असंतुलित कर दिया है और, चूँकि मानव-जीवन प्रकृति का अभिन्न अंग हैं, इसलिए बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने इंसान के जीवन को भी असंतुलित कर दिया है। फलस्वरूप आज का बिगड़ा पर्यावरण मनुष्य के स्वास्थ्य को बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है।

मनुष्य का स्वास्थ्य निस्संदेह उसकी बड़ी पूंजी है क्योंकि स्वास्थ्य शरीर में ही स्वस्थ विचारों का वास होता है। स्वस्थ विचारों में रचनात्मकता, तीव्रता और तत्परता होती है, और साथ ही कुछ कर गुजरने की इच्छा ही नहीं, क्षमता भी होती हैं। स्वस्थ शरीर में ही खुशहाल मन रहता है, और एक संतुष्ट और खुशहाल मन में ही यह सामर्थ्य होती है कि वह मानव मात्र के लिए सद्भावना रख सके और बिना किसी भेदभाव के स्व्यं अपने, अपने परिवार, देश और समाज के विकास के बारे में विचार कर सके। ऐसे हालातों में कहा जा सकता हैं, कि मनुष्य का अच्छा स्वास्थ्य न केवल उसके अपने लिए बल्कि उसके परिवार, देश और समाज सभी के लिए बहुत अहमियत रखता है। इसलिए मनुष्य के स्वास्थ्य पर पर्यावरण का कुप्रभाव निश्चय ही चिंता का विषय है।

पर्यावरण


पर्यावरण पर चर्चा करते समय सबसे पहले हम इस तथ्य पर विचार करेंगे कि आखिर इस शब्द का तात्पर्य क्या है। आम तौर पर समझा जाता है कि वायु, जल, मिट्टी और पेड़-पौधे मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। यह सच तो हैं, किंतु सीमित अर्थों में। व्यापक रूप से हम कह सकते हैं कि मनुष्य के आसपास का सारा वातावरण, घर के भीतर और बाहर, सभी कुछ पर्यावरण का एक हिस्सा है। इसलिए, यदि पानी और हवा का प्रदूषण मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, तो साथ ही घरों में इस्तेमाल होने वाली बहुत-सी आम चीजें भी हमारे पर्यावरण को दूषित करती हैं।

पर्यावरण और उसके दुष्प्रभाव को मूल रूप से दो भागों में बाँट सकते हैं— बाहरी और भीतरी।

बाहरी प्रदूषण


घर के बाहर हमें अधिकतर पर्यावरण के जिन अंगों का समाना करना पड़ता हैं, वे हैं :

1. वायु
2. जल, और
3. ध्वनि।

पर्यावरण के इन बाहरी भागों, उनसे होने वाले प्रदूषण, उसके कुप्रभाव वगैरह की चर्चा इतनी ज्यादा हो चुकी है कि आमतौर पर आज सभी जानते हैं कि किस तरह ये मानव शरीर को प्रभावित करते हैं।

वायु और स्वास्थ्य


पूरी पृथ्वी में वायु व्याप्त है। यह पर्यावरण का ऐसा अंग है जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। स्वच्छ वायु में सांस लेकर ही हम स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे में, जब वायु प्रदूषित हो जाती है तो मानव सांस लेते समय प्रदूषित हवा अपने भीतर लेता है जो उसके पूरे शरीर में फैल जाती है। ये प्रदूषित वायु मनुष्य के शरीर में विषैले पदार्थ पहुँचाती है जिनके कारण उसकी श्वास-प्रणाली प्रभावित होती है। फलस्वरूप, खाँसी, जुकाम से लेकर दमा जैसी बीमारियाँ उसे घेर लेती हैं। वायु प्रदूषण के कारण एलर्जी और दमा जैसी आम बीमारियों से लेकर कैंसर जैसी घातक बीमारी होने की संभावना होती है।

साथ ही प्रदूषित वायु मनुष्य की त्वचा को भी प्रभावित करती है। वर्तमान समय में जितनी ज्यादा मात्रा में त्वचा संबंधी रोग सामने आते हैं, उतने शायद ही पहले कभी आए हों। और यह तो स्वाभाविक ही है। हमारे शरीर में त्वचा ही वो भाग है, जो सबसे पहले वायु के संपर्क में आती है। ऐसे में यदि वह प्रदूषित वायु के संपर्क में आएगी, तो जाहिर तौर पर वायु प्रदूषण की परते हमारी त्वचा पर जमती जाएँगी और शीघ्र ही त्वचा संबंधी रोग के रूप में उभरेंगी।

फैक्ट्रियों और यातायात के साधनों से होने वाले धुएँ से न केवल सांस की बीमारियों का खतरा होता है, बल्कि ये पृथ्वी को बाहरी वातावरण से बचाने वाली ओजोन लेयर के लिए भी बहुत ही घातक सिद्ध हो रहे है। जाहिर है हमारे पर्यावरण को प्रभावित करने वाले ये हालात न केवल रोगों की संभावना प्रबल करते हैं, बल्कि हमारी पृथ्वी के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुके हैं।

समाधान


1. स्पष्टतः पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले दूषित धुएँ से बचने के लिए पर्यावरण के अनुकूल साधनों की खोज, विकास और प्रयोग आवश्यक है।
2. पेड़-पौधे वातारण से कार्बन डाइऑक्साइड खींचते हैं, और बदले में स्वच्छ ऑक्सीजन देते हैं। इसलिए बेहतर पर्यावरण के लिए वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना चाहिए।

जल और स्वास्थ्य


यदि पृथ्वी का दो-तिहाई हिस्सा जल से व्याप्त है तो हमारे शरीर का भी एक बड़ा भाग जल-युक्त होता है। मानव शरीर का तकरीबन 66 प्रतिशत भाग जलीय है और, अपने शरीर में जल के स्तर को संतुलित रखने के लिए एक स्वस्थ मनुष्य को एक दिन में कम से कम 7 से 8 गिलास पानी पीना चाहिए। जाहिर है मानव शरीर के लिए जल बहुत ही महत्त्वपूर्ण तत्व है। हमारे द्वारा पिया गया पानी हमारे पूरे शरीर में पहुँचता है, और शरीर के प्रत्येक अंग में जल की आवश्कता को पूरी करता है।

जल के संबंध में एक और बात याद रखनी बहुत जरूरी है, और वह यह कि संसार के सारे तत्वों में जल ही सर्वाधिक घुलनशील पदार्थ है। ऐसे में वातावरण में मौजूद किसी भी तरह का हानिकारक पदार्थ बहुत ही आसानी से उसमें घुल जाता है। ऐसी परिस्थिति में अगर मनुष्य प्रदूषित पानी पीता है तो उसके शरीर के भीतर सारे अंगों में वह प्रदूषित पानी ही पहुँचता है। पिए गए पानी के साथ शरीर में पहुँचे जीवाणु और विषाणु सीधे हमारे गले और पेट को प्रभावित करते हैं। और गले के संक्रमण, फेफड़े की बीमारियों, आँत संबंधी रोगों के साथ-साथ पीलिया जैसे गंभीर रोगों की संभावनाएँ प्रबल हो जाती हैं।

साथ ही पर्यावरण संबंधी इन समस्याओं का प्रभाव मनुष्य के रक्त तक भी पहुँच जाता है और अक्सर रक्तजनित रोगों के रूप में उभरता है। रक्तप्रवाह के प्रभावित होने पर मनुष्य का रक्तचाप प्रभावित होता है, और फलस्वरूप, उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। यही नहीं, इन सारी परिस्थितियों के कारण दिल की बीमारियों की संभावना भी प्रबल हो जाती है।

समाधान


1. जाहिर तौर पर पानी की सफाई बहुत ही आवश्यक है। इसलिए नदियों, तालाबों और कुएँ वगैरह की समय-समय पर नियमित रूप से सफाई करते रहना चाहिए।
2. पानी के स्रोतों में किसी भी तरह की गंदगी, कूड़ा वगैरह नहीं फेंकना चाहिए।
3. पीने के पानी से शौच आदि की नालियों को दूर रखना चाहिए।

ध्वनि और स्वास्थ्य


आधुनिक समाज में अति-विकसित औद्योगीकरण ने प्रकृति की स्वाभाविक शांति भी भंग कर दी है। आज के वातावरण में चिड़ियों की चहचहाहट, नदियों की कलकल, ठंडी हवा की आवाज, या पत्तियों की खड़खड़ाहट जैसी मधुरता वातावरण में मौजूद ध्वनि प्रदूषण के कारण दुर्लभ प्रतीत होने लगी है। औद्योगीकरण के शोर में जहाँ एक ओर प्राकृतिक आवाजें खो सी गई हैं, वहीं इस शोर ने मानव मन पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला है। परिणामस्वरूप आज के मनुष्य के मन में चिड़चिड़ापन, व्यथा और संताप बहुत ज्यादा बढ़ गए है। इसके कारण न केवल उसके स्वभाव में रूखापन और चिड़चिड़ाहट आई है, बल्कि उसके तनाव और थकान का स्तर भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इन सारे हालातों में मनुष्य के संतप्त मन का सीधा प्रभाव उसके शरीर पर पड़ता है, और शरीर की सहनशक्ति कम होती जाती है। यही नहीं, इसके चलते मनुष्य की जीवन प्रत्याशा भी कम होती है।

घरेलू पर्यावरण और प्रदूषण


दूसरी ओर घर के भीतर का पर्यावरण भी मनुष्य के स्वास्थ्य को काफी गहराई से प्रभावित करता है। घरों में प्रयोग की जाने वाली बहुत-सी चीजें घरेलू पर्यावरण को प्रभावित करती हैं, जैसे

1. डिटरजेंट साबुन
2. पेंट, वार्निश
3. परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स, शैम्पू
4. सिंथेटिक कपड़े कालीन
5. कीटनाशी दवाएँ
6. स्याही
7. सुगंधित पदार्थ
8. अनेक घुलनशील पदार्थ।

हालांकि यह आवश्यक नहीं कि इस सूची में दिए गए सारे पदार्थों का हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़े, लेकिन यह तो तय है, कि इसमें से ज्यादातर हमारे शरीर पर विपरीत प्रभाव ही डालते हैं। रोचक बात तो ये हैं, कि घरों में इस्तेमाल की जाने वाली रोजमर्रा की चीजों का दुष्प्रभाव हमारे शरीर पर अनजाने में ही पड़ता रहता है और कई बार हमें उन दुष्प्रभावों का अहसास भी नहीं होता। इस सूची में दिए गए पदार्थों का प्रयोग प्रत्येक घर में होता है। ऐसे में मान लीजिए कि घर में डिटरजेंट से सफाई की गई तो उस डिटरजेंट की महक पूरे घर में फैल जाती है, और हमारी नाक द्वारा हमारे शरीर में भी प्रवेश कर जाती है जो शरीर में घातक परिणाम छोड़ जाती है।

सामान्यतः इन पदार्थों के संपर्क में आने पर मनुष्य अपनी इंद्रियों द्वारा इन पदार्थों के हानिकारक रासायनिक तत्वों को आत्मसात कर लेता है, और इस तरह से शरीर में रोग के कीटाणुओं का प्रवेश होता है। यह जरूरी नहीं कि इन रोगाणुओं के कारण मानव शरीर किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हो जाए, लेकिन कम से कम सामान्य चिड़चिड़ापन तो होता ही है।

सुगंध का स्वास्थ्य पर प्रभाव


हमारे आसपास अनेक प्रकार की सुगंध मौजूद रहती हैं जिनमें से कुछ तो हमारे जीन की जरूरत होती हैं, और कुछ का प्रयोग हम अपने शौक पूरे करने के लिए करते हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए कि इन पदार्थों का हमारे स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। जहाँ एक ओर कीटनाशक दवाओं जैसी चीजों का इस्तेमाल करना हमारी मजबूरी है, वहीं शौक के लिए प्रयोग किए जाने वाले परफ्यूम वगैरह भी हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। सुगंधित पदार्थों के कारण मानव शरीर पर होने वाले प्रभाव इस प्रकार हैं-

1. सिरदर्द और माइग्रेन
2. एलर्जी और द्रवीय निस्सारण
3. सांस उखड़ने की समस्या
4. दमा
5. जुकाम
6. त्वचा पर दाने और खुजली
7. एक्जिमा
8. उल्टी और मितली
9. सिर चकराना

दरअसल होता यह है कि इन सुगंधित पदार्थों के सूक्ष्म कण हवा में मौजूद होते हैं, और जब भी मानव शरीर इन सुगंधित पदार्थों के संपर्क में आता है, वह सांस द्वारा, या त्वचा, आंखों और श्लेश्मा झिल्लियों द्वारा इन पदार्थों की अपने भीतर अवशोषित कर लेता है। फलस्वरूप ये कण शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँच जाते हैं और शरीर में रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।

समाधान


अब ऐसे हालातों में प्रश्न ये उठता है, कि इन पदार्थों के दुष्प्रभावों से कैसे बचा जाए। क्या यह संभव है कि इन पदार्थों का प्रयोग ही पूरी तरह से बंद कर दिया जाए? सैद्धांतिक रूप से तो ऐसा किया जा सकता है लेकिन व्यवहार में संभवतः यह बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतीत नहीं होता। इसलिए बेहतर तो यह होगा कि इस समस्या के ऐसे समाधान खोजे जाएं जो न केवल व्यावहारिक हों, बल्कि प्रकृति के नजदीक भी हों। जैसे

1. इन पदार्थों को बनाने में कम से कम रसायनों, और अधिक से अधिक प्राकृतिक घटकों का प्रयोग किया जाए
2. चूँकि एक जैसे अवयवों से बने हुए अनेक पदार्थों का एक साथ प्रयोग करने से उन अवयवों से होने वाले दुष्प्रभावों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है, इसलिए कोशिश यह करनी चाहिए कि ऐसे नुकसानदेह पदार्थों का एक साथ प्रयोग कम से कम किया जाए।
3. घरों और भवनों का निर्माण इस तरह से किया जाना चाहिए कि उनमें बाहरी हवा का आवागमन भी अधिक से अधिक हो।
4. पेड़-पौधे पर्यावरण को स्वच्छ रखने के अचूक उपाय हैं। इसलिए घरों के भीतर और बाहर वृक्षारोपण को अधिकाधिक प्रोत्साहित करना चाहिए।

हालांकि यह जरूरी नहीं कि पर्यावरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों का प्रभाव प्रत्येक मनुष्य पर समान रूप से हो, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रोग-प्रतिरोधक क्षमता अलग-अलग होती है, लेकिन फिर भी लगातार संपर्क में आते रहने से ये हानिकाकरक पदार्थ हर किसी पर अपना कुछ न कुछ प्रभाव तो छोड़ ही जाते हैं। और परिणा सदैव एक ही होता है—रुग्ण मन और रूग्ण शरीर। हम जानते हैं कि स्वस्थ और सशक्त समाज के निर्माण के लिए स्वस्थ शरीर और संतुष्ट मन अनिवार्य है इसलिए मन और शरीर को रोगग्रस्त करने वाले इन हानिकारक पदार्थों को दूर करना ही हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। केवल तभी हम एक शक्तिशाली और खुशहाल समाज की स्थापना कर सकेंगे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

TAGS

health and environment essay in Hindi, health and environment issue in Hindi, safety health and environment ppt in Hindi, safety health and environment article in Hindi, health and environment quotes in Hindi, safety health and environment policy in Hindi.

योजना, अप्रैल 2002

0 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *